टीवी न्यूज़ चैनल में आजकल खाने की चीज़ों में मिलावट की खबरों का दौर है। कभी सब्जी, कभी दाल, कभी मसाले, तो कभी दूध में मिलावट की खबरें देखने को मिलती है। इन सब मिलावटों के बीच एक और मिलावट है जहाँ हम सब का ध्यान ही नहीं जाता। ऐसी मिलावट जो रोज़ होती है और उस मिलावट को हम सभी बड़ी आसानी से पचा जाते हैं और डकार भी नहीं लेते। सच मानिये, मैं कोई पहेली नहीं बुझा रहा हूँ। मैं तो उस "मिलावट" की ओर इशारा कर रहा हूँ जो खबरों के साथ हो रही है। वो "मिलावट" जो कई खबरिया चैनल धड़ल्ले से रोजाना कर रहे हैं और बेचारा दर्शक चुपचाप उसे बर्दाश्त कर रहा है। पिछले दिनों दिल्ली में एक सेमिनार के दौरान भी यही मुद्दा सामने आया, जब आउटलुक पत्रिका के संपादक नीलाभ ने कुछ मीडिया संस्थानों पर उंगली उठाई। उनका कहना था कि जैसे कोई भी धंधा एक कानून के दायरे में आता है, एक रेगुलेशन के तहत गवर्न होता है, वैसा ही खबरों के साथ क्यों नहीं ? अगर आप तेल बेच रहे हैं तो सिर्फ़ तेल ही बेच सकते हैं, उसमें चर्बी की मिलावट की तो अपराध होगा और सज़ा मिलेगी। ऐसा कुछ खबरों के "व्यापार" के साथ क्यों नहीं होता ? अगर आप ख़बर छाप या दिखा रहे हैं तो सिर्फ़ ख़बर छापिये और दिखाइए, उसमें मिलावट मत करिए। कोई कुछ कहे या कोई भी तर्क दे, बात सौ फीसदी सही और खरी है। आख़िर खबरों में ये "मिलावट" कब तक होगी ? कब तक हम खबरों के नाम पर आलतू-फालतू की चीज़ों को देखते-सुनते और पढ़ते रहेंगे ?
Sunday, July 12, 2009
Monday, June 29, 2009
माइकल के लिए "मच-मच" क्यों ?
पॉप संगीतकार माइकल जैक्सन की मौत क्या हो गई... ऐसा लगा मानो दुनिया भर के लोगों पर पहाड़ टूट पड़ा हो। देश भर के सभी बड़े टीवी चैनलों ने पहले तो उसकी मौत की ख़बर को चिल्ला-चिल्ला कर बताया-दिखाया... और उसके बाद भी कईयों का पेट नहीं भरा तो अब वो माइकल की मौत की गुत्थी सुलझाने में लगे हैं। सवाल ये है कि आख़िर माइकल जैक्सन की मौत से हमें क्या लेना-देना ??? किसी ने कहा कि सब टीआरपी का चक्कर है। लेकिन मुझे बात जंची नहीं। आख़िर दिल्ली के सीलमपुर या फिर मुंबई के धारावी की झुग्गियों में रह कर दो जून की रोटी के लिए "संघर्ष" करने वाले एक आम हिन्दुस्तानी को क्या पड़ी है कि वो माइकल जैक्सन के ज़िन्दगी के तमाम पहलुओं पर गौर करे ! उसकी मौत पर चीखे-चिल्लाये। या फिर टीवी के सामने बैठकर घंटों टीवी जगत के "शर्लोक होम्स" की तफ्तीश पर दिमाग खपाए।
मैं कुछ सोच ही रहा था कि आरुषि की याद आ गई। बेचारी आरुषि... जिसकी मौत एक मिस्ट्री ही बन गई है। और माइकल की मौत भी तो एक मिस्ट्री बनती जा रही है। मुझे अपने सवाल का जवाब मिल गया था।
